मैं तो सिर्फ कहने के लिए अन्नदाता हूँ | Main To Sirf Kehne Ke Liye Annadata Hun | Short Story In Hindi


काली अँधेरी रात थी विनोद खेत में अकेला था . ..अचानक से होने वाली सरसराहट से वह उठ खड़ा हुआ ओर देखता हे कि खेत में बहुत सारे जंगली सूअर आ गये है . विनोद वहाँ से मदद के लिए भागा ओर मुख्य सड़क पर जा पंहुचा वहाँ उसने गुजरने वाले राहगीरों से मदद की गुहार लगायी पर उसकी मदद के लिए कोई नहीं रुका |

थोडा आगे चलकर विनोद को एक कार दिखाई दी |

..क्या आप मेरी मदद करेंगे ? विनोद ने गाडी के मालिक से पूछा

मेरी गाडी ख़राब है ..मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता, उसने जवाब दिया |

मेरे खेत में .."जंगली सूअर" घुस आये है, कृपा करके उनको वहाँ से भगाने में मेरी सहायता कीजिये.. "विनोद ने विनम्र निवेदन किया"   

में भी मुसीबत में फँसा हुआ हूँ ..भला में क्या मदद कर पाउँगा तुम्हारी! वह बोला

अवश्य ..आप कर सकते है, मेरी फसल का नुकसान होने से आप बचा सकते है, विनोद ने फिर से आग्रह किया

आखिरकार वो मदद के लिए तैयार हो गया ओर बोला ..मुझे सुबह होने से पहले मेरे घर पहुंचना है, इसलिए पहले तुम्हें मेरी गाडी ठीक करने में मेरी सहायता करनी होगी |

विनोद ठहरा किसान भला उसकी क्या मदद कर सकता था, फिर भी उसने पूछा कि मैं क्या सहायता कर सकता हु आपकी?

तुम्हे गाडी को धक्का मारकर ..मैकेनिक के पास चलना होगा, जब तक गाडी ठीक होगी उतने समय में, मैं तुम्हारा काम कर दूंगा

विनोद के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी ओर वो तैयार हो गया

जेसा कि तय था विनोद ने गाडी को धक्का मारकर मैकेनिक तक पंहुचा दिया.. ओर बोला 

..सुअरों ने बहुत नुकसान किया होगा, हमें जल्दी निकलना चाहिए! नहीं तो फसल बर्बाद हो जाएगी

इतना सुनते ही गाडी वाले ने अपनी जेब से सौ रुपये का नोट निकाल कर विनोद की ओर इशारा करते हुए बोला.. "इतना काफी होगा न, मेरी मदद के बदले इसे रखो मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकता"

यह सुनकर ..विनोद को गुस्सा भी आया ओर अफ़सोस भी हुआ ..आखिर क्यों? उसने किसी राह चलते अजनबी पर भरोसा कर लिया | फिर भी उसने इसका जवाब देना ही उचित समझा

..हम किसानो को "अन्नदाता" का स्थान दिया जाता है ओर तुमने उसी किसान के साथ विश्वासघात किया है |

इतना कहकर विनोद वहाँ से चला जाता है ओर पूरे रास्ते वह यही सोचता रहता हे कि आखिर, क्यों? कोई किसान की मदद नहीं करना चाहता | घर पहुंचकर सारा किस्सा अपनी पत्नी को सुनाता है.

यह सब सुनकर उसकी पत्नी रमा बोलती हे

..अगर फसल बर्बाद हो गयी तो बच्चों की पढाई का क्या होगा? ..हम लोग खायेंगे क्या?

मैं अकेला भला क्या कर पाता ..विनोद ने जवाब दिया

मैं चलती हूँ आपके साथ जंगली सुअरों को भगाने ..रमा ने पूंछा

बिना समय गंवाए दोनों ने खेत कि ओर जल्दी जल्दी पैर चलाये, आने जाने में देर होने के कारण फसल को बहुत नुकसान पहुँचा ..अपनी जान को जोखिम में डालकर दोनों ने मिलकर सुअरों को भगाया |

अगले दिन जब सारे परिवार के सदस्य घर के आँगन में बेठे थे ओर टीवी देख रहे थे टीवी में खबर आ रही थी कि सरकार पिछड़े वर्गों को आरक्षण दे रही है |

पापा ये आरक्षण क्या होता है? ..जिज्ञासावश विनोद के पुत्र "कान्हा" ने पूंछा

बेटा ये आर्थिक रियायत होती है जो पिछड़े वर्गों को दी जा रही है | ..विनोद ने सरल शब्दों में कान्हा को समझाया

..तो पापा ये रियायत हम जेसे लोगो को क्यों नहीं मिलती. उसने फिरसे पूंछा

नहीं बेटा हम जेसे किसानो की चिंता भला किसे होगी सबको सिर्फ वोट लेने की चिंता है | ..विनोद ने मायूस होकर जवाब दिया 

कुछ दिन बीते ओर खेत में फसल तैयार हो गयी, फसल काटने के बाद विनोद मंडी में अपनी फसल बेचने निकल पड़ा ओर रस्ते में क्या देखता है कि एक अन्य किसान जिसका ट्रेक्टर पंक्चर हो गया ओर वह सड़क किनारे आने - जाने वाले लोगो से मदद मांग रहा था |

विनोद ने रुकते हुए उससे पूछा ..क्या हुआ भाई काहे चिंतित लग रहे हो

क्या बताऊ भाई आज तो समय ही ख़राब है, फसल बेचने मंडी जा रहा था ओर बीच रस्ते में ही टायर पंक्चर हो गया ..अब पता नहीं समय पर केसे पहुचुंगा | उसने अपना हाल बताया

में कुछ मदद कर सकु तो बताओ ..विनोद ने पूछा 

अब तक बहुत से लोगो से मदद मांग चुका हु पर कोई नहीं रुका ..किसी ने मेरी तरफ ठीक से देखा तक नहीं, तुम भले इन्सान नजर आते हो. बस तुम मुझे आगे किसी पंक्चर वाले के यहाँ तक छोड़ देना 

 यहाँ सबको सिर्फ अपने स्वार्थ से मतलब है ..कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता विनोद ने इतना कहकर उसे अपने साथ ले लिया ओर आगे जाकर छोड़ दिया

मंडी पहुचकर विनोद देखता हे ..मानो जेसे मेला लगा हो, किसान लेनदारो के आगे पीछे घूम रहे है उनके सामने झोली फेलाकर अपनी फसल का नमूना दिखा रहे है | यह सब देखकर विनोद मन ही मन सोचता हे कि ..आज के समय में किसान कितना लाचार हो गया है वो मौसम की मार झेलता है ..ओर फिर भी अगर थोड़ी बहुत फसल निकल आये तब भी अपने मनचाहे दाम पर नहीं बेच पाता ..उसे लेनदार के तय किये हुए मूल्य पर ही अपनी फसल बेचनी पड़ती है |

आज ..अगर कोई भी बड़ी दुकानों या मॉल में जाता है तो वहाँ कभी मोल-भाव नहीं करता ! ..लेकिन वहीं दूसरी ओर सब्जीवाली गरीब बुढ़िया से सिर्फ 5 रुपये के लिए बहस हो जाती है |

चलो जेसा भी है किसान फिर भी उम्मीद के बल पर टिका हुआ है ..कभी तो ये दुनिया बदलेगी, कभी तो परिस्तिथिया उसके अनुकूल होंगी 

यही सब देखकर विनोद कहता है कि "मैं तो सिर्फ कहने के लिए अन्नदाता हूँ"

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